बाबूजी धीरे चलना, प्यार में जरा संभलना

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आज के भौतिकवादी दौर में लोगों को अधिक से अधिक सुख और सम्पति पाने की चाह ने व्यक्ति को काफी व्यस्त बना दिया है। शायद इसी सोंच ने मानव को इतना गतिशील बना दिया है की वह रुकने का नाम ही नहीं लेता,उसको यह भी पता नहीं कि जिस दिन जिंदगी ठहर जाएगी उस दिन उनका क्या होगा?जिसकी जिम्मेवारी उसके कंधे पर है।

“जिंदगी तो बेवफा है एक दिन रूठ जाएगी,
मौत मेहबूबा है जिसको साथ लेकर जाएगी”

प्रायः देखा जाता है कि वाहन चलाते समय कई ऐसे लोग जो कनपट्टी एवं कंधे से मोबाइल सटाकर अपने प्रियजनों से बातें करते हुए उन्हें उन्हें ऐसा करना खतरों से खेलने के बराबर है। ऐसा करने वाले कभी भी परिवार और समाज के सच्चे प्रियजन नहीं हो सकते,इसमें एक ही दोषी बल्कि कानून और प्रशासन वयवस्था की लचर स्थिति भी है, जिससे आये दिन दुर्घटनाओं में वृद्धि हुई है।

आजकल सड़कों पर साइकिल कम एवं मोटरसाइकिल और बड़े वाहन ज्यादा चलते हुए दिखाई पड़ते हैं क्योंकि दहेज़ में अब साइकिल शब्द ही भूल गए हैं,भले ही वाहन चलाना ठीक से आता हो या नहीं, या पॉकेट में पैसा हो या नहीं,अगर कहीं जाने का प्रोग्राम हो तो कहीं न कहीं से पैसे का व्यवस्था हो ही जायेगा इसमें कोई शक नहीं, लेकिन इस भीड़ -भरी जिंदगी में इंसान धीरे चलने का नाम ही नहीं लेता है।

वह यह नहीं सोचता कि दुर्घटना का शिकार हो गया तो क्या होगा? जिसका बोझ उसके कंधे पर है, या जिस प्रिय से कोई वादा किया है मिलने का, उसके सपनों को संजोने का, उसके अरमानों को पूरा करने का,उसका क्या होगा?ऐसा करनेवाले कभी भी परिवार और समाज के सच्चे प्रियजन नहीं हो सकते। इसे रोकने के लिए प्रशासन को कड़ी कार्यवाई करनी चाहिए ताकि लोगों को सतर्कता के साथ -साथ वाहन चलाने कि सही प्रवृति हो,तभी जाकर यह उक्ति सही साबित होगी कि “बाबूजी धीरे चलना,प्यार में जरा संभलना।

नरेंद्र कुमार
ब्यूरो प्रमुख, पश्चिम चम्पारण

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